History Revenge and National Security: A Dangerous Narrative for India
Introduction: When History Becomes a Political Weapon
भारत जैसे विविधता वाले देश में इतिहास सिर्फ किताबों का विषय नहीं है, बल्कि राजनीति, पहचान और सत्ता का हथियार भी बन चुका है। हाल के वर्षों में “इतिहास से बदला लेने” जैसे जुमले बार-बार सार्वजनिक मंचों से सुनाई दे रहे हैं। यह सोच न सिर्फ समाज को बांटती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को भी वैचारिक उकसावे में बदल देती है। History Revenge Narrative in India | Ajit Doval, National Security & Political Debate
जब यह भाषा Ajit Doval जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के नाम से जोड़ी जाती है, तब सवाल और भी गंभीर हो जाता है। क्या किसी राष्ट्र की सुरक्षा नीति का आधार बदले और प्रतिशोध की सोच हो सकती है?
Who Is Ajit Doval and Why His Words Matter
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद सिर्फ सलाह देने का नहीं होता, बल्कि यह पद देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा रणनीति की दिशा तय करता है। इस भूमिका में बोले गए शब्द आम राजनीतिक बयान नहीं होते, बल्कि उनका असर करोड़ों युवाओं की सोच पर पड़ता है।
अगर “युवाओं को इतिहास का बदला लेना चाहिए” जैसी बातों को सामान्य कर दिया जाए, तो यह देश के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। इतिहास को समझना और उससे सीख लेना अलग बात है, लेकिन उसे बदले की आग में झोंक देना बिल्कुल अलग और विनाशकारी सोच है।
The Concept of ‘Revenge from History’: Logical or Absurd?
इतिहास से बदला लेने की अवधारणा पहली नज़र में जोश से भरी लग सकती है, लेकिन जरा गहराई से सोचिए।
History Is Not a Single Enemy
भारत पर अलग-अलग काल में अलग-अलग ताकतों ने शासन किया। मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप से आई शक्तियों का इतिहास में जिक्र है। अगर आज हम “इतिहास से बदला” लेने निकलें, तो तर्क के हिसाब से हमें दर्जनों देशों से दुश्मनी मोल लेनी पड़ेगी।
यह न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि हास्यास्पद भी।
Selective History Is the Real Problem
इतिहास का इस्तेमाल अक्सर चुनिंदा तथ्यों को उठाकर किया जाता है। जो बातें मौजूदा नैरेटिव के अनुकूल हों, उन्हें उछाला जाता है और जो असहज सवाल पैदा करें, उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यही सबसे बड़ा खतरा है।
Internal Betrayals: The Uncomfortable Truth
अगर सच में इतिहास से बदला लेने की बात की जाए, तो सबसे पहले नजर भारत के अंदर की ऐतिहासिक सच्चाइयों पर जानी चाहिए।
Indian Rulers Who Helped Foreign Powers
इतिहास गवाह है कि भारत पर हमला करने वाली बाहरी ताकतों को कई बार स्थानीय राजाओं और शासकों का समर्थन मिला। सत्ता, स्वार्थ और आपसी दुश्मनी ने विदेशी आक्रमणों को आसान बनाया।
तो क्या “इतिहास से बदला” लेने का मतलब इन सभी वंशों को निशाना बनाना होगा?
जाहिर है, यह न संभव है और न ही नैतिक।
Role of Organizations During British Rule
भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी हर संगठन एक जैसा नहीं था। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि कुछ संगठनों ने ब्रिटिश शासन का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया।
यह सवाल उठाना जरूरी है कि अगर बदले की राजनीति चलेगी, तो क्या इन संगठनों की भूमिका पर भी उतनी ही तीखी नजर डाली जाएगी?
यहीं पर “इतिहास से बदला” लेने की सोच खुद अपने ही जाल में फंस जाती है।
RSS, Hindu Mahasabha and the Freedom Movement Debate
आज जिन संगठनों को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा ठेकेदार बताया जाता है, उनके ऐतिहासिक किरदार पर सवाल उठते रहे हैं। यह कोई नया विमर्श नहीं है, बल्कि कई दस्तावेजों और शोधों में इस पर चर्चा हो चुकी है।
अगर इतिहास को हथियार बनाया जाएगा, तो वह सिर्फ विरोधियों को नहीं, बल्कि अपने समर्थकों को भी कठघरे में खड़ा करेगा।
National Security vs Ideological Provocation
राष्ट्रीय सुरक्षा का मतलब सीमाओं की रक्षा, आतंरिक स्थिरता और सामाजिक सौहार्द होता है। लेकिन जब सुरक्षा की भाषा में धार्मिक या ऐतिहासिक बदले का जहर मिलाया जाता है, तो परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
Youth as the Soft Target
युवाओं को भावनात्मक नारों से उकसाना सबसे आसान होता है। “तुम्हारे साथ हजार साल अन्याय हुआ है” जैसी बातें गुस्सा पैदा करती हैं, समाधान नहीं।
देश को 50 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नारों से नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और वैज्ञानिक सोच से बनाया जाता है।
Does Revenge Build a Nation?
कोई भी विकसित राष्ट्र बदले की भावना पर खड़ा नहीं होता। जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने इतिहास की गलतियों से सीख ली, बदला नहीं लिया।
भारत की ताकत भी हमेशा उसकी सहिष्णुता, विविधता और आत्मविश्वास रही है, न कि प्रतिशोध।
आज के दौर में राजनीतिक नैरेटिव, इतिहास और विचारधाराएं सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि डिजिटल टूल्स और AI-generated visuals के ज़रिए भी तेजी से फैलती हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कंटेंट कैसे बनाया और प्रभावित किया जा रहा है। इसी संदर्भ में आप यह भी पढ़ सकते हैं:
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The Real Question India Must Ask
असल सवाल यह नहीं है कि इतिहास से बदला कब लिया जाए।
असल सवाल यह है कि:
- क्या हम इतिहास से सीखना चाहते हैं या उसे बेचकर राजनीति करना चाहते हैं?
- क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को विचारधारा की ढाल बनाना सही है?
- क्या युवाओं को भविष्य की तैयारी करानी है या अतीत की लड़ाई में झोंकना है?
Conclusion: History Needs Understanding, Not Vengeance
इतिहास हमें आईना दिखाता है, हथियार नहीं देता।
जो देश अतीत में उलझे रहते हैं, वे भविष्य खो देते हैं।
भारत को अगर सच में मजबूत बनाना है, तो उसे बदले की नहीं, समझदारी की राजनीति चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे समाज को जोड़ें, न कि पुराने घावों को कुरेदें।
इतिहास से बदला लेने की नहीं, इतिहास से आगे बढ़ने की ज़रूरत है।






